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अर्जुन उवाच |
arjuna uvāca .
अर्जुन ने कहा -- जो भक्त, सतत युक्त होकर इस (पूर्वोक्त) प्रकार से आपकी उपासना करते हैं और जो भक्त अक्षर, और अव्यक्त की उपासना करते हैं, उन दोनों में कौन उत्तम योगवित् है।।
अर्जुन उवाच |
arjuna uvāca .
अर्जुन ने कहा -- हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशनिषूदन ! मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ।।
अर्जुन उवाच |
arjuna uvāca .
अर्जुन ने कहा हे -- कृष्ण ! आप कर्मों के संन्यास की और फिर योग (कर्म के आचरण) की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में एक जो निश्चय पूर्वक श्रेयस्कर है, उसको मेरे लिए कहिये।।
अर्जुन उवाच |
arjuna uvāca .
अर्जुन ने कहा -हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है? तथा कर्म क्या है? और अधिभूत नाम से क्या कहा गया है? तथा अधिदैव नाम से क्या कहा जाता है,
सञ्जय उवाच |
sañjaya uvāca .
संजय ने कहा -- इस प्रकार करुणा और विषाद से अभिभूत, अश्रुपूरित नेत्रों वाले आकुल अर्जुन से मधुसूदन ने यह वाक्य कहा।।
धृतराष्ट्र उवाच |
dhṛtarāṣṭra uvāca .
धृतराष्ट्र ने कहा -- हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्र हुए युद्ध के इच्छुक (युयुत्सव:) मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्रीभगवान् ने कहा -- तुम अनसूयु (दोष दृष्टि रहित) के लिए मैं इस गुह्यतम ज्ञान को विज्ञान के सहित कहूँगा, जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बंधन) से मुक्त हो जाओगे।।
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्री भगवान् ने कहा -- समस्त ज्ञानों में उत्तम परम ज्ञान को मैं पुन: कहूंगा, जिसको जानकर सभी मुनिजन इस (लोक) से जाकर (इस जीवनोपरान्त) परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।।
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्री भगवान् ने कहा -- (ज्ञानी पुरुष इस संसार वृक्ष को) ऊर्ध्वमूल और अध:शाखा वाला अश्वत्थ और अव्यय कहते हैं; जिसके पर्ण छन्द अर्थात् वेद हैं, ऐसे (संसार वृक्ष) को जो जानता है, वह वेदवित् है।।
अर्जुन उवाच |
arjuna uvāca .
अर्जुन ने कहा -- हे केशव ! मैं, प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।।
अर्जुन उवाच |
arjuna uvāca .
अर्जुन ने कहा -- हे कृष्ण ! जो लोग शास्त्रविधि को त्यागकर (केवल) श्रद्धा युक्त यज्ञ (पूजा) करते हैं, उनकी स्थिति (निष्ठा) कौन सी है ?क्या वह सात्त्विक है अथवा राजसिक या तामसिक ?
अर्जुन उवाच |
arjuna uvāca .
हे जनार्दन यदि आपको यह मान्य है कि कर्म से ज्ञान श्रेष्ठ है तो फिर हे केशव आप मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों प्रवृत्त करते हैं
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्री भगवान् ने कहा -- अभय, अन्त:करण की शुद्धि, ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और आर्जव।।
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्रीभगवान् ने कहा -- जो पुरुष कर्मफल पर आश्रित न होकर कर्तव्य कर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है, न कि वह जिसने केवल अग्नि का और क्रियायों का त्याग किया है।।
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्रीभगवान् ने कहा --- मैंने इस अविनाशी योग को विवस्वान् (सूर्य देवता) से कहा (सिखाया); विवस्वान् ने मनु से कहा; मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।।
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्रीभगवान् ने कहा -- हे महाबाहो ! पुन: तुम मेरे परम वचनों का श्रवण करो, जो मैं तुझ अतिशय प्रेम रखने वाले के लिये हित की इच्छा से कहूँगा।।
अर्जुन उवाच |
arjuna uvāca .
अर्जुन ने कहा -- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए जो परम गोपनीय, अध्यात्मविषयक वचन (उपदेश) आपके द्वारा कहा गया, उससे मेरा मोह दूर हो गया है।।
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
हे पार्थ ! मुझमें असक्त हुए मन वाले तथा मदाश्रित होकर योग का अभ्यास करते हुए जिस प्रकार तुम मुझे समग्ररूप से, बिना किसी संशय के, जानोगे वह सुनो।।
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः |
jñānaṃ te.ahaṃ savijñānamidaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ .
मैं तुम्हारे लिए विज्ञान सहित इस ज्ञान को अशेष रूप से कहूँगा जिसको जानकर यहाँ (जगत् में) फिर और कुछ जानने योग्य (ज्ञातव्य) शेष नहीं रह जाता है।।
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
adhaścordhvaṃ prasṛtāstasya śākhā guṇapravṛddhā viṣayapravālāḥ .
उस वृक्ष की शाखाएं गुणों से प्रवृद्ध हुईं नीचे और ऊपर फैली हुईं हैं; (पंच) विषय इसके अंकुर हैं; मनुष्य लोक में कर्मों का अनुसरण करने वाली इसकी अन्य जड़ें नीचे फैली हुईं हैं।।
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् |
rājavidyā rājaguhyaṃ pavitramidamuttamam .
यह ज्ञान राजविद्या (विद्याओं का राजा) और राजगुह्य (सब गुह्यों अर्थात् रहस्यों का राजा) एवं पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष ज्ञानवाला और धर्मयुक्त है, तथा करने में सरल और अव्यय है।।
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्रीभगवान् ने कहा -- हे कौन्तेय ! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसे तत्त्वज्ञ जन, क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्रीभगवान् ने कहा -- मुझमें मन को एकाग्र करके नित्ययुक्त हुए जो भक्तजन परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे, मेरे मत से, युक्ततम हैं अर्थात् श्रेष्ठ हैं।।
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः |
idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ .
इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे स्वरूप (सार्धम्यम्) को प्राप्त पुरुष सृष्टि के आदि में जन्म नहीं लेते और प्रलयकाल में व्याकुल भी नहीं होते हैं।।
सञ्जय उवाच |
sañjaya uvāca .
संजय ने कहा -- पाण्डव-सैन्य की व्यूह रचना देखकर राजा दुर्योधन ने आचार्य द्रोण के पास जाकर ये वचन कहे।
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव |
yaṃ saṃnyāsamiti prāhuryogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava .
हे पाण्डव ! जिसको (शास्त्रवित्) संन्यास कहते हैं, उसी को तुम योग समझो; क्योंकि संकल्पों को न त्यागने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।।
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे |
vyāmiśreṇeva vākyena buddhiṃ mohayasīva me .
आप इस मिश्रित वाक्य से मेरी बुद्धि को मोहितसा करते हैं अत आप उस एक (मार्ग) को निश्चित रूप से कहिये जिससे मैं परम श्रेय को प्राप्त कर सकूँ।।
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन |
adhiyajñaḥ kathaṃ ko.atra dehe.asminmadhusūdana .
और हे मधुसूदन ! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? और संयत चित्त वाले पुरुषों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जाने जाते हैं,
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया |
bhavāpyayau hi bhūtānāṃ śrutau vistaraśo mayā .
हे कमलनयन ! मैंने भूतों की उत्पत्ति और प्रलय आपसे विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपका अव्यय माहात्म्य (प्रभाव) भी सुना है।।
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्रीभगवान् ने कहा -- (कुछ) कवि (पण्डित) जन काम्य कर्मों के त्याग को "संन्यास" समझते हैं और विचारशील जन समस्त कर्मों के फलों के त्याग को "त्याग" कहते हैं।।
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्री भगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! तुमको इस विषम स्थल में यह मोह कहाँ से उत्पन्न हुआ? यह आर्य आचरण के विपरीत न तो स्वर्ग प्राप्ति का साधन ही है और न कीर्ति कराने वाला ही है।।
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्रीभगवान् ने कहा -- कर्मसंन्यास और कर्मयोग ये दोनों ही परम कल्याणकारक हैं; परन्तु उन दोनों में कर्मसंन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है।।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् |
ahiṃsā satyamakrodhastyāgaḥ śāntirapaiśunam .
अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, अपैशुनम् (किसी की निन्दा न करना), भूतमात्र के प्रति दया, अलोलुपता , मार्दव (कोमलता), लज्जा, अचंचलता।।
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्री भगवान् ने कहा -- देहधारियों (मनुष्यों) की वह स्वाभाविक (ज्ञानरहित) श्रद्धा तीन प्रकार की - सात्त्विक, राजसिक और तामसिक - होती हैं, उसे तुम मुझसे सुनो।।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः |
evaṃ paramparāprāptamimaṃ rājarṣayo viduḥ .
इस प्रकार परम्परा से प्राप्त हुये इस योग को राजर्षियों ने जाना, (परन्तु) हे परन्तप ! वह योग बहुत काल (के अन्तराल) से यहाँ (इस लोक में) नष्टप्राय हो गया।।
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः |
na me viduḥ suragaṇāḥ prabhavaṃ na maharṣayaḥ .
मेरी उत्पत्ति (प्रभव) को न देवतागण जानते हैं और न महर्षिजन; क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ।।
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये |
manuṣyāṇāṃ sahasreṣu kaścidyatati siddhaye .
सहस्रों मनुष्यों में कोई ही मनुष्य पूर्णत्व की सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और उन प्रयत्नशील साधकों में भी कोई ही पुरुष मुझे तत्त्व से जानता है।।
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप |
aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya parantapa .
हे परन्तप ! इस धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूपी संसार में रहते हैं (भ्रमण करते हैं)।।
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति |
jñeyaḥ sa nityasaṃnyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati .
जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा, वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है; क्योंकि, हे महाबाहो ! द्वन्द्वों से रहित पुरुष सहज ही बन्धन मुक्त हो जाता है।।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
na rūpamasyeha tathopalabhyate nānto na cādirna ca sampratiṣṭhā .
इस (संसार वृक्ष) का स्वरूप जैसा कहा गया है वैसा यहाँ उपलब्ध नहीं होता है, क्योंकि इसका न आदि है और न अंत और न प्रतिष्ठा ही है। इस अति दृढ़ मूल वाले अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ असङ्ग शस्त्र से काटकर ...৷৷৷৷।।
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते |
ārurukṣormuneryogaṃ karma kāraṇamucyate .
योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मुनि के लिए कर्म करना ही हेतु (साधन) कहा है और योगारूढ़ हो जाने पर उसी पुरुष के लिए शम को (शांति, संकल्पसंन्यास) साधन कहा गया है।।
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः |
sa evāyaṃ mayā te.adya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ .
वह ही यह पुरातन योग आज मैंने तुम्हें कहा (सिखाया) क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो। यह उत्तम रहस्य है।।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते |
klaibyaṃ mā sma gamaḥ pārtha naitattvayyupapadyate .
हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।।
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् |
yo māmajamanādiṃ ca vetti lokamaheśvaram .
जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकों के महान् ईश्वर के रूप में जानता है, र्मत्य मनुष्यों में ऐसा संमोहरहित (ज्ञानी) पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाता है।।
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर |
evametadyathāttha tvamātmānaṃ parameśvara .
हे परमेश्वर ! आप अपने को जैसा कहते हो, यह ठीक ऐसा ही है। (परन्तु) हे पुरुषोत्तम ! मैं आपके ईश्वरीय रूप को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत |
sattvānurūpā sarvasya śraddhā bhavati bhārata .
हे भारत सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके सत्त्व (स्वभाव, संस्कार) के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जिस श्रद्धा वाला है वह स्वयं भी वही है अर्थात् जैसी जिसकी श्रद्धा वैसा ही उसका स्वरूप होता है।।
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्री भगवान् ने कहा हे निष्पाप (अनघ) अर्जुन इस श्लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है ज्ञानियों की (सांख्यानां) ज्ञानयोग से और योगियों की कर्मयोग से।।
मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् |
mama yonirmahad brahma tasmingarbhaṃ dadhāmyaham .
हे भारत ! मेरी महद् ब्रह्मरूप प्रकृति, (भूतों की) योनि है, जिसमें मैं गर्भाधान करता हूँ; इससे समस्त भूतों की उत्पत्ति होती है।।
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् |
paśyaitāṃ pāṇḍuputrāṇāmācārya mahatīṃ camūm .
हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र (धृष्टद्द्युम्न) द्वारा व्यूहाकार खड़ी की गयी पाण्डु पुत्रों की इस महती सेना को देखिये।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते |
ye tvakṣaramanirdeśyamavyaktaṃ paryupāsate .
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