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दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च |
dambho darpo.abhimānaśca krodhaḥ pāruṣyameva ca .
हे पार्थ ! दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी (पारुष्य) और अज्ञान यह सब आसुरी सम्पदा है।।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् |
uddharedātmanātmānaṃ nātmānamavasādayet .
मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध: पतन नहीं करना चाहिये; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है।।
तानहं द्विषतः क्रुरान्संसारेषु नराधमान् |
tānahaṃ dviṣataḥ krurānsaṃsāreṣu narādhamān .
ऐसे उन द्वेष करने वाले, क्रूरकर्मी और नराधमों को मैं संसार में बारम्बार (अजस्रम्) आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ अर्थात् उत्पन्न करता हूँ।।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि |
maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāttariṣyasi .
मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे।।