Anvayaअन्वय

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BG 16.4Bhagavad Gītā · ch. 16

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च |

dambho darpo.abhimānaśca krodhaḥ pāruṣyameva ca .

हे पार्थ ! दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी (पारुष्य) और अज्ञान यह सब आसुरी सम्पदा है।।

EgoAngerEnvy
BG 6.5Bhagavad Gītā · ch. 6

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् |

uddharedātmanātmānaṃ nātmānamavasādayet .

मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध: पतन नहीं करना चाहिये; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है।।

DisciplineEgo
BG 16.19Bhagavad Gītā · ch. 16

तानहं द्विषतः क्रुरान्संसारेषु नराधमान् |

tānahaṃ dviṣataḥ krurānsaṃsāreṣu narādhamān .

ऐसे उन द्वेष करने वाले,  क्रूरकर्मी और नराधमों को मैं संसार में बारम्बार (अजस्रम्) आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ अर्थात् उत्पन्न करता हूँ।।

EnvyDespairEgo
BG 18.58Bhagavad Gītā · ch. 18

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि |

maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāttariṣyasi .

मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे।।

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