Anvayaअन्वय

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BG 10.8Bhagavad Gītā · ch. 10

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते |

ahaṃ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṃ pravartate .

मैं ही सबका प्रभव स्थान हूँ; मुझसे ही सब (जगत्) विकास को प्राप्त होता है, इस प्रकार जानकर बुधजन भक्ति भाव से युक्त होकर मुझे ही भजते हैं।।

WisdomPurposeGratitude
BG 2.20Bhagavad Gītā · ch. 2

न जायते म्रियते वा कदाचिन्

na jāyate mriyate vā kadācin nāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ .

यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है,  शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।।

FearDeathCourageGratitudeImpermanence
BG 11.44Bhagavad Gītā · ch. 11

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं

tasmātpraṇamya praṇidhāya kāyaṃ prasādaye tvāmahamīśamīḍyam .

इसलिये हे भगवन्! मैं शरीर के द्वारा साष्टांग प्रणिपात करके स्तुति के योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिये प्रार्थना करता हूँ। हे देव! जैसे पिता पुत्र के, मित्र अपने मित्र के और प्रिय अपनी प्रिया के(अपराध को क्षमा करता है), वैसे ही आप भी मेरे अपराधों को क्षमा कीजिये।।

ForgivenessHumilityGratitude