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अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् |
amānitvamadambhitvamahiṃsā kṣāntirārjavam .
अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम।।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च |
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca .
भूतमात्र के प्रति जो द्वेषरहित है तथा सबका मित्र तथा करुणावान् है; जो ममता और अहंकार से रहित, सुख और दु:ख में सम और क्षमावान् है।।
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
tasmātpraṇamya praṇidhāya kāyaṃ prasādaye tvāmahamīśamīḍyam .
इसलिये हे भगवन्! मैं शरीर के द्वारा साष्टांग प्रणिपात करके स्तुति के योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिये प्रार्थना करता हूँ। हे देव! जैसे पिता पुत्र के, मित्र अपने मित्र के और प्रिय अपनी प्रिया के(अपराध को क्षमा करता है), वैसे ही आप भी मेरे अपराधों को क्षमा कीजिये।।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि |
maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāttariṣyasi .
मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे।।