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धृतराष्ट्र उवाच |
dhṛtarāṣṭra uvāca .
धृतराष्ट्र ने कहा -- हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्र हुए युद्ध के इच्छुक (युयुत्सव:) मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
श्रीभगवानुवाच |
śrībhagavānuvāca .
श्रीभगवान् ने कहा -- कर्मसंन्यास और कर्मयोग ये दोनों ही परम कल्याणकारक हैं; परन्तु उन दोनों में कर्मसंन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है।।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः |
yajñārthātkarmaṇo.anyatra loko.ayaṃ karmabandhanaḥ .
यज्ञ के लिये किये हुए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्म में प्रवृत्त हुआ यह पुरुष कर्मों द्वारा बंधता है इसलिए हे कौन्तेय आसक्ति को त्यागकर यज्ञ के निमित्त ही कर्म का सम्यक् आचरण करो।।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ |
sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau .
सुख-दु:ख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान करके युद्ध के लिये तैयार हो जाओ; इस प्रकार तुमको पाप नहीं होगा।।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् |
yataḥ pravṛttirbhūtānāṃ yena sarvamidaṃ tatam .
जिस (परमात्मा) से भूतमात्र की प्रवृत्ति अर्थात् उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस (परमात्मा) की स्वकर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
karmaṇyevādhikāraste mā phaleṣu kadācana .
कर्म करने मात्र में तुम्हारा अधिकार है? फल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु वाले मत होना और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय |
yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya .
हे धनंजय आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है।।