Anvayaअन्वय

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BG 13.8Bhagavad Gītā · ch. 13

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् |

amānitvamadambhitvamahiṃsā kṣāntirārjavam .

अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम।।

HumilityCompassionDisciplinePatience
BG 12.13Bhagavad Gītā · ch. 12

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च |

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca .

भूतमात्र के प्रति जो द्वेषरहित है तथा सबका मित्र तथा करुणावान् है; जो ममता और अहंकार से रहित, सुख और दु:ख में सम और क्षमावान् है।।

HumilityCompassionEnvyEquanimity
BG 12.14Bhagavad Gītā · ch. 12

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः |

santuṣṭaḥ satataṃ yogī yatātmā dṛḍhaniścayaḥ .

जो संयतात्मा, दृढ़निश्चयी योगी सदा सन्तुष्ट है, जो अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पण किये हुए है, जो ऐसा मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है।।

ForgivenessCompassionPatienceEquanimity
BG 9.29Bhagavad Gītā · ch. 9

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः |

samo.ahaṃ sarvabhūteṣu na me dveṣyo.asti na priyaḥ .

मैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ।।

LonelinessCompassionEquanimity
BG 9.31Bhagavad Gītā · ch. 9

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति |

kṣipraṃ bhavati dharmātmā śaśvacchāntiṃ nigacchati .

हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।।

DespairHopeCompassion
BG 18.46Bhagavad Gītā · ch. 18

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् |

yataḥ pravṛttirbhūtānāṃ yena sarvamidaṃ tatam .

जिस (परमात्मा) से भूतमात्र की प्रवृत्ति अर्थात् उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस (परमात्मा) की स्वकर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।।

PurposeDutyCompassion