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अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् |
amānitvamadambhitvamahiṃsā kṣāntirārjavam .
अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम।।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च |
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca .
भूतमात्र के प्रति जो द्वेषरहित है तथा सबका मित्र तथा करुणावान् है; जो ममता और अहंकार से रहित, सुख और दु:ख में सम और क्षमावान् है।।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः |
santuṣṭaḥ satataṃ yogī yatātmā dṛḍhaniścayaḥ .
जो संयतात्मा, दृढ़निश्चयी योगी सदा सन्तुष्ट है, जो अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पण किये हुए है, जो ऐसा मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है।।
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः |
samo.ahaṃ sarvabhūteṣu na me dveṣyo.asti na priyaḥ .
मैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ।।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति |
kṣipraṃ bhavati dharmātmā śaśvacchāntiṃ nigacchati .
हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् |
yataḥ pravṛttirbhūtānāṃ yena sarvamidaṃ tatam .
जिस (परमात्मा) से भूतमात्र की प्रवृत्ति अर्थात् उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस (परमात्मा) की स्वकर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।।