Anvayaअन्वय

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BG 8.5Bhagavad Gītā · ch. 8

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् |

antakāle ca māmeva smaranmuktvā kalevaram .

और जो कोई पुरुष अन्तकाल में मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं।।

MortalityHopeDeath
BG 4.9Bhagavad Gītā · ch. 4

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः |

janma karma ca me divyamevaṃ yo vetti tattvataḥ .

हे अर्जुन ! मेरा जन्म और कर्म दिव्य है,  इस प्रकार जो पुरुष तत्त्वत:  जानता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को नहीं प्राप्त होता;  वह मुझे ही प्राप्त होता है।।

HopeWisdomImpermanence
BG 9.22Bhagavad Gītā · ch. 9

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते |

ananyāścintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate .

अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।।

HopeDesireDiscipline
BG 9.31Bhagavad Gītā · ch. 9

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति |

kṣipraṃ bhavati dharmātmā śaśvacchāntiṃ nigacchati .

हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।।

DespairHopeCompassion
BG 18.66Bhagavad Gītā · ch. 18

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |

sarvadharmānparityajya māmekaṃ śaraṇaṃ vraja .

सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।।

DespairHopeDoubtFear