Anvayaअन्वय

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BG 4.9Bhagavad Gītā · ch. 4

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः |

janma karma ca me divyamevaṃ yo vetti tattvataḥ .

हे अर्जुन ! मेरा जन्म और कर्म दिव्य है,  इस प्रकार जो पुरुष तत्त्वत:  जानता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को नहीं प्राप्त होता;  वह मुझे ही प्राप्त होता है।।

HopeWisdomImpermanence
BG 2.13Bhagavad Gītā · ch. 2

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा |

dehino.asminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā .

जैसे इस देह में देही जीवात्मा की कुमार, युवा और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही उसको अन्य शरीर की प्राप्ति होती है;  धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता है।।

ImpermanenceDeathWisdom
BG 2.20Bhagavad Gītā · ch. 2

न जायते म्रियते वा कदाचिन्

na jāyate mriyate vā kadācin nāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ .

यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है,  शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।।

FearDeathCourageGratitudeImpermanence