Anvayaअन्वय

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BG 6.5Bhagavad Gītā · ch. 6

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् |

uddharedātmanātmānaṃ nātmānamavasādayet .

मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध: पतन नहीं करना चाहिये; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है।।

DisciplineEgo
BG 13.8Bhagavad Gītā · ch. 13

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् |

amānitvamadambhitvamahiṃsā kṣāntirārjavam .

अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम।।

HumilityCompassionDisciplinePatience
BG 6.12Bhagavad Gītā · ch. 6

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः |

tatraikāgraṃ manaḥ kṛtvā yatacittendriyakriyaḥ .

वहाँ (आसन में बैठकर) मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में किये हुये आत्मशुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।।

DisciplinePeaceAction
BG 9.22Bhagavad Gītā · ch. 9

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते |

ananyāścintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate .

अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।।

HopeDesireDiscipline
BG 6.35Bhagavad Gītā · ch. 6

श्रीभगवानुवाच |

śrībhagavānuvāca .

श्रीभगवान् कहते हैं --  हे महबाहो ! नि:सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; परन्तु, हे कुन्तीपुत्र ! उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है।।

DisciplineDesireWisdom
BG 4.38Bhagavad Gītā · ch. 4

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते |

na hi jñānena sadṛśaṃ pavitramiha vidyate .

इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला,  निसंदेह,  कुछ भी नहीं है। योग में संसिद्ध पुरुष स्वयं ही उसे (उचित) काल में आत्मा में प्राप्त करता है।।

WisdomDiscipline
BG 3.43Bhagavad Gītā · ch. 3

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना |

evaṃ buddheḥ paraṃ buddhvā saṃstabhyātmānamātmanā .

इस प्रकार बुद्धि से परे (शुद्ध) आत्मा को जानकर आत्मा (बुद्धि) के द्वारा आत्मा (मन) को वश में करके, हे महाबाहो ! तुम इस दुर्जेय (दुरासदम्) कामरूप शत्रु को मारो।।

DesireDisciplineWisdom