Anvayaअन्वय

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BG 7.2Bhagavad Gītā · ch. 7

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः |

jñānaṃ te.ahaṃ savijñānamidaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ .

मैं तुम्हारे लिए विज्ञान सहित इस ज्ञान को अशेष रूप से कहूँगा जिसको जानकर यहाँ (जगत् में) फिर और कुछ जानने योग्य (ज्ञातव्य) शेष नहीं रह जाता है।।

WisdomPurpose
BG 10.8Bhagavad Gītā · ch. 10

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते |

ahaṃ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṃ pravartate .

मैं ही सबका प्रभव स्थान हूँ; मुझसे ही सब (जगत्) विकास को प्राप्त होता है, इस प्रकार जानकर बुधजन भक्ति भाव से युक्त होकर मुझे ही भजते हैं।।

WisdomPurposeGratitude
BG 4.9Bhagavad Gītā · ch. 4

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः |

janma karma ca me divyamevaṃ yo vetti tattvataḥ .

हे अर्जुन ! मेरा जन्म और कर्म दिव्य है,  इस प्रकार जो पुरुष तत्त्वत:  जानता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को नहीं प्राप्त होता;  वह मुझे ही प्राप्त होता है।।

HopeWisdomImpermanence
BG 2.13Bhagavad Gītā · ch. 2

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा |

dehino.asminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā .

जैसे इस देह में देही जीवात्मा की कुमार, युवा और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही उसको अन्य शरीर की प्राप्ति होती है;  धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता है।।

ImpermanenceDeathWisdom
BG 6.30Bhagavad Gītā · ch. 6

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |

yo māṃ paśyati sarvatra sarvaṃ ca mayi paśyati .

जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता।।

LonelinessPeaceWisdom
BG 6.35Bhagavad Gītā · ch. 6

श्रीभगवानुवाच |

śrībhagavānuvāca .

श्रीभगवान् कहते हैं --  हे महबाहो ! नि:सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; परन्तु, हे कुन्तीपुत्र ! उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है।।

DisciplineDesireWisdom
BG 4.38Bhagavad Gītā · ch. 4

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते |

na hi jñānena sadṛśaṃ pavitramiha vidyate .

इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला,  निसंदेह,  कुछ भी नहीं है। योग में संसिद्ध पुरुष स्वयं ही उसे (उचित) काल में आत्मा में प्राप्त करता है।।

WisdomDiscipline
BG 4.40Bhagavad Gītā · ch. 4

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति |

ajñaścāśraddadhānaśca saṃśayātmā vinaśyati .

अज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाता है,  (उनमें भी) संशयी पुरुष के लिये न यह लोक है,  न परलोक और न सुख।।

DoubtWisdom
BG 3.43Bhagavad Gītā · ch. 3

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना |

evaṃ buddheḥ paraṃ buddhvā saṃstabhyātmānamātmanā .

इस प्रकार बुद्धि से परे (शुद्ध) आत्मा को जानकर आत्मा (बुद्धि) के द्वारा आत्मा (मन) को वश में करके, हे महाबाहो ! तुम इस दुर्जेय (दुरासदम्) कामरूप शत्रु को मारो।।

DesireDisciplineWisdom
BG 2.56Bhagavad Gītā · ch. 2

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः |

duḥkheṣvanudvignamanāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ .

दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है? जिसके मन से राग? भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं? वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।

PeaceSteadinessWisdom
BG 18.58Bhagavad Gītā · ch. 18

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि |

maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāttariṣyasi .

मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे।।

EgoWisdomHumility