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तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः |
tatraikāgraṃ manaḥ kṛtvā yatacittendriyakriyaḥ .
वहाँ (आसन में बैठकर) मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में किये हुये आत्मशुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |
yo māṃ paśyati sarvatra sarvaṃ ca mayi paśyati .
जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता।।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः |
duḥkheṣvanudvignamanāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ .
दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है? जिसके मन से राग? भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं? वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṃ samudramāpaḥ praviśanti yadvat .
जैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में (अनेक नदियों के) जल (उसे विचलित किये बिना) समा जाते हैं? वैसे ही जिस पुरुष के प्रति कामनाओं के विषय उसमें (विकार उत्पन्न किये बिना) समा जाते हैं? वह पुरुष शान्ति प्राप्त करता है? न कि भोगों की कामना करने वाला पुरुष।।