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अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च |
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca .
भूतमात्र के प्रति जो द्वेषरहित है तथा सबका मित्र तथा करुणावान् है; जो ममता और अहंकार से रहित, सुख और दु:ख में सम और क्षमावान् है।।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
mātrāsparśāstu kaunteya śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥ .
हे कुन्तीपुत्र ! शीत और उष्ण और सुख दुख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग का प्रारम्भ और अन्त होता है; वे अनित्य हैं, इसलिए, हे भारत ! उनको तुम सहन करो।।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः |
santuṣṭaḥ satataṃ yogī yatātmā dṛḍhaniścayaḥ .
जो संयतात्मा, दृढ़निश्चयी योगी सदा सन्तुष्ट है, जो अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पण किये हुए है, जो ऐसा मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है।।
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः |
samo.ahaṃ sarvabhūteṣu na me dveṣyo.asti na priyaḥ .
मैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ।।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ |
sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau .
सुख-दु:ख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान करके युद्ध के लिये तैयार हो जाओ; इस प्रकार तुमको पाप नहीं होगा।।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय |
yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya .
हे धनंजय आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है।।