Anvayaअन्वय

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BG 5.2Bhagavad Gītā · ch. 5

श्रीभगवानुवाच |

śrībhagavānuvāca .

श्रीभगवान् ने कहा --  कर्मसंन्यास और कर्मयोग ये दोनों ही परम कल्याणकारक हैं;  परन्तु उन दोनों में कर्मसंन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है।।

DutyDetachmentAction
BG 2.11Bhagavad Gītā · ch. 2

श्रीभगवानुवाच |

śrībhagavānuvāca .

श्री भगवान् ने कहा -- (अशोच्यान्) जिनके लिये शोक करना उचित नहीं है, उनके लिये तुम शोक करते हो और ज्ञानियों के से वचनों को कहते हो, परन्तु ज्ञानी पुरुष मृत (गतासून्) और जीवित (अगतासून्) दोनों के लिये शोक नहीं करते हैं।।

GriefSufferingDetachment
BG 2.38Bhagavad Gītā · ch. 2

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ |

sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau .

सुख-दु:ख,  लाभ-हानि और जय-पराजय को समान करके युद्ध के लिये तैयार हो जाओ;  इस प्रकार तुमको पाप नहीं होगा।।

DutyCourageEquanimityDetachment
BG 2.47Bhagavad Gītā · ch. 2

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |

karmaṇyevādhikāraste mā phaleṣu kadācana .

कर्म करने मात्र में तुम्हारा अधिकार है? फल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु वाले मत होना और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।।

DutyAnxietyDetachmentAction
BG 2.48Bhagavad Gītā · ch. 2

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय |

yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya .

हे धनंजय आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है।।

DutyEquanimityBalanceDetachment