Anvayaअन्वय

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BG 9.22Bhagavad Gītā · ch. 9

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते |

ananyāścintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate .

अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।।

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BG 6.35Bhagavad Gītā · ch. 6

श्रीभगवानुवाच |

śrībhagavānuvāca .

श्रीभगवान् कहते हैं --  हे महबाहो ! नि:सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; परन्तु, हे कुन्तीपुत्र ! उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है।।

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BG 3.37Bhagavad Gītā · ch. 3

श्रीभगवानुवाच |

śrībhagavānuvāca .

श्रीभगवान् ने कहा -- रजोगुण में उत्पन्न हुई यह 'कामना' है,  यही क्रोध है; यह महाशना (जिसकी भूख बड़ी हो) और महापापी है, इसे ही तुम यहाँ (इस जगत् में) शत्रु जानो।।

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BG 3.43Bhagavad Gītā · ch. 3

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना |

evaṃ buddheḥ paraṃ buddhvā saṃstabhyātmānamātmanā .

इस प्रकार बुद्धि से परे (शुद्ध) आत्मा को जानकर आत्मा (बुद्धि) के द्वारा आत्मा (मन) को वश में करके, हे महाबाहो ! तुम इस दुर्जेय (दुरासदम्) कामरूप शत्रु को मारो।।

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BG 2.62Bhagavad Gītā · ch. 2

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते |

dhyāyato viṣayānpuṃsaḥ saṅgasteṣūpajāyate .

विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उसमें आसक्ति हो जाती है? आसक्ति से इच्छा और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है।।

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BG 2.70Bhagavad Gītā · ch. 2

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं

āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṃ samudramāpaḥ praviśanti yadvat .

जैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में (अनेक नदियों के) जल (उसे विचलित किये बिना) समा जाते हैं? वैसे ही जिस पुरुष के प्रति कामनाओं के विषय उसमें (विकार उत्पन्न किये बिना) समा जाते हैं? वह पुरुष शान्ति प्राप्त करता है? न कि भोगों की कामना करने वाला पुरुष।।

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