Anvayaअन्वय

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BG 7.2Bhagavad Gītā · ch. 7

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः |

jñānaṃ te.ahaṃ savijñānamidaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ .

मैं तुम्हारे लिए विज्ञान सहित इस ज्ञान को अशेष रूप से कहूँगा जिसको जानकर यहाँ (जगत् में) फिर और कुछ जानने योग्य (ज्ञातव्य) शेष नहीं रह जाता है।।

WisdomPurpose
BG 10.8Bhagavad Gītā · ch. 10

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते |

ahaṃ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṃ pravartate .

मैं ही सबका प्रभव स्थान हूँ; मुझसे ही सब (जगत्) विकास को प्राप्त होता है, इस प्रकार जानकर बुधजन भक्ति भाव से युक्त होकर मुझे ही भजते हैं।।

WisdomPurposeGratitude
BG 3.9Bhagavad Gītā · ch. 3

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः |

yajñārthātkarmaṇo.anyatra loko.ayaṃ karmabandhanaḥ .

यज्ञ के लिये किये हुए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्म में प्रवृत्त हुआ यह पुरुष कर्मों द्वारा बंधता है इसलिए हे कौन्तेय आसक्ति को त्यागकर यज्ञ के निमित्त ही कर्म का सम्यक् आचरण करो।।

DutyPurposeAction
BG 18.46Bhagavad Gītā · ch. 18

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् |

yataḥ pravṛttirbhūtānāṃ yena sarvamidaṃ tatam .

जिस (परमात्मा) से भूतमात्र की प्रवृत्ति अर्थात् उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस (परमात्मा) की स्वकर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।।

PurposeDutyCompassion