क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् | अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ||१२-५||
BG 12.6
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः | अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ||१२-६||
ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi saṃnyasya matparaḥ . ananyenaiva yogena māṃ dhyāyanta upāsate ||12-6||
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् | भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ||१२-७||
BG 12.6
↑/↓ or ←/→ to move · Esc to exit · recordings stay on your device